रिश्तों में गणित ना लगाओ

रिश्तों में गणित ना लगाओ,
रिश्तों में हिसाब उचित नहीं,
लेन-देन भले ही चलता रहे,
लेकिन वह पैसों का नहीं प्यार का हो;
ज़िम्मेदारी किसीं एक की नहीं, सब की है,
रिश्ता दिल से निभाना ज़रूरी हैं,
किसींका उदार रखना अच्छा नहीं,
फिर वह छोटीसीं छोटी मदत ही क्यों ना हो!

इतना मुश्किल नहीं है कोई रिश्ता निभाना,
लेकिन हम ही उसे उलझाते है,
फिर उसे सुलझाते सुलझाते,
रिश्तों में दरार पड़ जाती है;
यह दरार विश्वास तोड़ती हैं,
और अविश्वास जिस रिश्ते में हो,
वह रिश्ता ज़िंदगी भर,
बोझ लगने लगता हैं!

यह समस्या गंभीर होती जाएगी,
और इसका निवारण उतना ही मुश्किल,
पछतावा ही होगा आख़िर में,
और मन ही मन तुम रोओगे;
इसीलिए इस बात का एहसास करो,
शिद्दत से निभाना अपना हर रिश्ता,
एक सूत्र हमेशा याद रखो,
रिश्तों में गणित कभी ना लगाओगे!

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